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टीबी मुक्त भारत अभियान में‘नोटशीट सिंडिकेट’ का खुलासा?जबलपुर स्वास्थ्य विभाग में करोड़ों के खेल पर EOW जांच...
जबलपुर।गरीब मरीजों को टीबी जैसी गंभीर बीमारी से राहत दिलाने के लिए शुरू की गई केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना अब जबलपुर में कथित भ्रष्टाचार के दलदल में फंसती नजर आ रही है।राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP) के नाम पर स्वास्थ्य विभाग में जिस तरह करोड़ों रुपये की खरीद प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे हैं,उसने पूरे प्रशासनिक सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है।आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) ने शिकायतकर्ता अरविंद मिश्रा की शिकायत पर प्रकरण क्रमांक 268/2026 दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।इसके बाद स्वास्थ्य विभाग में फाइलों से ज्यादा चर्चा उन अधिकारियों की हो रही है जिन पर “नोटशीट के जरिए भ्रष्टाचार”चलाने के आरोप लगे हैं।
क्या नोटशीट को बना दिया गया‘भ्रष्टाचार का हथियार’?
जिला कार्यक्रम समन्वयक DPC) सुनील शर्मा,जो पिछले 8 वर्षों से इसी पद पर पदस्थ बताए जा रहे हैं, उन पर आरोप है कि उन्होंने अपने प्रशासनिक अधिकारों का उपयोग नियमों के पालन के बजाय कथित फर्जी खरीद प्रक्रिया को वैध दिखाने में किया।
शिकायतकर्ता अरविंद मिश्रा ने दावा किया है कि भारत सरकार की गाइडलाइन के तहत डीपीसी को बजट प्रबंधन,खरीद प्रक्रिया की निगरानी और स्टॉक सत्यापन की जिम्मेदारी दी गई थी,लेकिन इन्हीं जिम्मेदारियों की आड़ में नोटशीट का ऐसा जाल बुना गया जिसमें नियम पीछे छूटते चले गए।
सूत्रों के अनुसार नोटशीट पर पहला हस्ताक्षर डीपीसी स्तर से होने के कारण पूरी प्रक्रिया की शुरुआती जिम्मेदारी सीधे उन्हीं पर आती है।आरोप यह भी है कि वरिष्ठ अधिकारियों के अनुमोदन को सुरक्षा कवच बनाकर जवाबदेही से बचने का प्रयास किया गया।
बिना टेंडर,बिना मांग पत्र और बिना रिकॉर्ड के खरीदारी?
शिकायतकर्ता अरविंद मिश्रा ने eagle news 24x7 से बातचीत के दौरान में बताया कि सरकारी खरीद प्रक्रिया के लगभग हर मूल नियम को नजरअंदाज किया गया।
आरोपों के मुताबिक—
•सामग्री खरीद के लिए वैध मांग पत्र जारी नहीं किए गए,
•प्री-अप्रूवल नोटशीट नहीं ली गई,
•विभागीय क्रय समिति की निर्धारित अनुशंसा नहीं कराई गई,
•टेंडर प्रक्रिया नहीं अपनाई गई,
•MP Public Health Corporation की उपलब्ध दर सूची को दरकिनार किया गया,
•स्टोर रजिस्टर में सामग्री की एंट्री तक नहीं की गई,
•और तय बाजार दर से अधिक कीमतों पर खरीद दिखाई गई।
इतना ही नहीं,शिकायत में यह भी कहा गया है कि आपातकालीन परिस्थितियों में 3 या 7 दिन की निविदा प्रक्रिया अपनाई जा सकती थी, लेकिन वह भी नहीं की गई।
“कागजों में सप्लाई,भुगतान की तैयारी”
मामले में सबसे गंभीर आरोप यह है कि तीन निजी फर्मों को फायदा पहुंचाने के लिए कथित रूप से कागजी खरीद दिखाई गई।शिकायतकर्ता का दावा है कि स्टोर में सामान की वास्तविक उपलब्धता के बिना ही भुगतान प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
शिकायत में पूर्व डीपीएम आदित्य तिवारी पर सत्यापन और निलंबित पूर्व CMHO डॉ.संजय मिश्रा पर अनुमोदन देने के आरोप लगाए गए हैं।
स्वास्थ्य विभाग के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि यदि जांच निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़ी तो कई पुराने भुगतान और फाइलें भी दोबारा जांच के दायरे में आ सकती हैं।
शासन में मचा अंदरूनी हड़कंप
EOW जांच शुरू होने के बाद भोपाल से लेकर जबलपुर तक स्वास्थ्य विभाग में बेचैनी बढ़ गई है।सूत्रों के मुताबिक कई पुराने रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं और कुछ अधिकारियों ने फाइल मूवमेंट को लेकर अंदरखाने बैठकों का दौर भी शुरू कर दिया है।
विभागीय गलियारों में यह चर्चा तेज है कि कहीं यह मामला सिर्फ एक जिले तक सीमित न रह जाए।यदि जांच गहराई तक पहुंची तो प्रदेश के अन्य जिलों की खरीद प्रक्रियाओं पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।
पहले भी विवादों में रह चुके हैं अधिकारी
गौरतलब है कि पूर्व CMHO डॉ.संजय मिश्रा और आदित्य तिवारी पहले भी कथित अनियमितताओं के मामलों में कार्रवाई झेल चुके हैं।शासन द्वारा डॉ.मिश्रा को निलंबित किया जा चुका है,जबकि आदित्य तिवारी से विभागीय प्रभार वापस लिया गया था।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस बार भी मामला फाइलों में दब जाएगा या फिर करोड़ों रुपये के कथित खेल का पूरा नेटवर्क बेनकाब होगा?























