Editorial|हम खुद ऊंच-नीच के पुरोधा,फिर दूसरों पर दोषारोपण क्यों?समाज को आईना दिखाता सवाल...

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हम खुद ऊंच-नीच के पुरोधा,फिर दूसरों पर दोषारोपण क्यों?समाज को आईना दिखाता सवाल...

जाति,वर्ग और भेदभाव की बहस के बीच बड़ा प्रश्न—जब हम खुद बदलना नहीं चाहते,तो दोष किसे दें?

विशेष लेख|Eagle News 24x7

भारत में जाति, वर्ग और भेदभाव की बहस कोई नई नहीं है। अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि अगड़े वर्गों ने पिछड़ों, दलितों और वंचित समुदायों का शोषण किया। वहीं दूसरी ओर सामान्य वर्ग के लोगों की शिकायत रहती है कि आरक्षण व्यवस्था ने उनके अधिकार सीमित कर दिए हैं।

लेकिन इन तमाम आरोप-प्रत्यारोपों के बीच एक सवाल अक्सर अनसुना रह जाता है—क्या समाज के हर वर्ग के भीतर भी ऊंच-नीच की सोच मौजूद नहीं है?

भेदभाव केवल एक दिशा में नहीं

हाल ही में मध्यप्रदेश के सागर जिले में एक दूल्हे के घोड़ी चढ़ने को लेकर विवाद सामने आया।यह मामला इसलिए चर्चा में रहा क्योंकि इसमें टकराव उन वर्गों के बीच नहीं था,जिनके बीच आमतौर पर सामाजिक तनाव की बात की जाती है,बल्कि उसी व्यापक आरक्षित समाज के भीतर अलग-अलग समुदायों के बीच था।

यह घटना संकेत देती है कि समस्या केवल“एक वर्ग बनाम दूसरा वर्ग”नहीं,बल्कि मानसिकता की है।

क्या हर समाज के भीतर परतें नहीं हैं?

यदि निष्पक्षता से देखा जाए,तो लगभग हर जाति,समुदाय और सामाजिक समूह के भीतर अपना एक आंतरिक पदक्रम मौजूद है।कोई स्वयं को श्रेष्ठ मानता है,कोई दूसरे को कमतर।यही सोच पीढ़ियों से चली आ रही सामाजिक दूरी को बनाए रखती है।

जब तक हर समूह अपने भीतर झांककर यह नहीं पूछेगा कि वह दूसरों को किस नजर से देखता है,तब तक केवल बाहरी आरोपों से समाधान संभव नहीं।

नेताओं को दोष देना आसान,आत्मचिंतन कठिन

अक्सर कहा जाता है कि समाज को नेताओं ने बांटा,इतिहास ने बांटा, सत्ता ने बांटा। यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है, लेकिन यह भी सच है कि जो समाज भीतर से विभाजित होता है, वही आसानी से बांटा जा सकता है।

यदि लोग आपसी सम्मान,समानता और सामाजिक मेलजोल पर टिके रहते,तो विभाजन की राजनीति इतनी सफल नहीं होती।

समाधान क्या है?

•जाति आधारित श्रेष्ठता-बोध छोड़ना होगा

•सामाजिक सम्मान को व्यवहार में लाना होगा

•शिक्षा और संवाद बढ़ाना होगा

•हर वर्ग को आत्ममंथन करना होगा

•पीड़ित बनाम दोषी की स्थायी राजनीति से बाहर आना होगा

अंतिम सवाल

यदि हर व्यक्ति खुद को ऊंचा और दूसरे को नीचा समझता रहेगा,तो समाज में बराबरी कैसे आएगी?

कबीर और संत परंपरा ने सदियों पहले कहा था:

“हरि को भजे सो हरि का होई,

जात-पांत पूछे नहीं कोई।”


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