Special Report:मध्यप्रदेश पर बढ़ता कर्ज बना चिंता का विषय,हर महीने हजारों करोड़ ब्याज चुका रही सरकार

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मध्यप्रदेश पर बढ़ता कर्ज बना चिंता का विषय,हर महीने हजारों करोड़ ब्याज चुका रही सरकार

बढ़ते राजकोषीय दबाव के बीच खर्च नियंत्रण और राजस्व बढ़ाने की मांग तेज

भोपाल।मध्यप्रदेश की आर्थिक स्थिति को लेकर अब गंभीर बहस शुरू हो गई है।लगातार बढ़ते कर्ज,भारी ब्याज भुगतान और राजकोषीय घाटे ने सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते खर्चों पर नियंत्रण और राजस्व बढ़ाने के ठोस उपाय नहीं किए गए,तो आने वाले वर्षों में प्रदेश पर आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है।

वित्तीय आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश सरकार ने हाल ही में करीब 1800 करोड़ रुपये का नया कर्ज लिया है।यह कर्ज लगभग 7.86 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर पर उठाया गया है। जानकारी के मुताबिक चालू वित्तीय वर्ष शुरू होने के डेढ़ महीने के भीतर ही राज्य सरकार लगभग 4600 करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर्ज ले चुकी है।

हर महीने ब्याज में जा रहे हजारों करोड़

आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार मध्यप्रदेश सरकार को हर महीने करीब 2386 करोड़ रुपये केवल ब्याज भुगतान के रूप में चुकाने पड़ रहे हैं।वहीं कुल ब्याज देनदारी का आंकड़ा लगभग 28,636 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदेश का राजकोषीय घाटा अब FRBM Act की निर्धारित 3 प्रतिशत सीमा के बेहद करीब पहुंच गया है,जो आने वाले समय में आर्थिक संतुलन के लिए चुनौती बन सकता है।

खर्च कम करने की मांग तेज

विशेषज्ञों का कहना है कि बिना सरकारी नौकरियों,वेतन और पेंशन में कटौती किए भी सरकार बड़ी बचत कर सकती है। इसके लिए सबसे पहले गैरजरूरी खर्चों पर नियंत्रण जरूरी बताया जा रहा है।

बचत के लिए सुझाए गए प्रमुख उपाय

•सरकारी विज्ञापनों और प्रचार खर्च में कटौती

•मंत्रियों और अधिकारियों के विदेशी व घरेलू दौरों पर नियंत्रण

•बड़े समारोह,उत्सव और आयोजनों का सीमित बजट

•घाटे वाले सार्वजनिक उपक्रमों (PSU) का पुनर्गठन

•डिजिटल और वर्चुअल मीटिंग्स को बढ़ावा

जानकारों का अनुमान है कि केवल विज्ञापन और यात्रा खर्च में कटौती कर सरकार सालाना हजारों करोड़ रुपये की बचत कर सकती है।

घाटे वाले निगमों पर भी सवाल

मध्यप्रदेश की कई सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां लगातार घाटे में चल रही हैं।आंकड़ों के अनुसार घाटे वाली PSU कंपनियों पर राज्य सरकार की गारंटी देनदारी लगभग 43,701 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है।

हालांकि कुछ निगम जैसे पाठ्यपुस्तक निगम और खनिज निगम फायदे में बताए जा रहे हैं। हाल ही में पाठ्यपुस्तक निगम में नई नियुक्तियों को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हुई थीं।

GST चोरी रोकने पर जोर

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि राजस्व बढ़ाने का सबसे प्रभावी तरीका कर संग्रह प्रणाली को मजबूत करना है। इसके लिए—

GST चोरी रोकने

•स्टांप ड्यूटी संग्रह बढ़ाने

•सरकारी जमीनों के लंबित पट्टों को नियमित करने

•डिजिटल मॉनिटरिंग मजबूत करने

•जैसे कदम उठाने की जरूरत बताई जा रही है।

विश्लेषकों का दावा है कि इन उपायों से हर साल करीब 10 से 15 हजार करोड़ रुपये तक अतिरिक्त राजस्व जुटाया जा सकता है।

जनसंख्या और संसाधनों पर बढ़ता दबाव

विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती आबादी,बेरोजगारी,शहरी दबाव और सीमित संसाधनों के कारण आने वाले वर्षों में राज्य सरकार के सामने आर्थिक चुनौतियां और बढ़ सकती हैं। हालांकि जनसंख्या और समुदाय आधारित दावों को लेकर विशेषज्ञ केवल आधिकारिक जनगणना और प्रमाणित आंकड़ों पर भरोसा करने की सलाह देते हैं।

आर्थिक अनुशासन की जरूरत

राजनीतिक और आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि मध्यप्रदेश को दीर्घकालीन आर्थिक स्थिरता के लिए विकास, निवेश,रोजगार और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाना होगा।लगातार बढ़ते कर्ज और ब्याज भुगतान को अब प्रदेश के लिए “चेतावनी की घंटी” माना जा रहा है।


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