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मच्छरों की नाजुक नब्ज पर कभी हमला नहीं करता निगम, हर साल की अवैध कमाई मारे जाने का डर


जबलपुर, अधिकांश मच्छर केवल पानी में ही पैदा होते हैं, ठीक से कीटनाशकों के छिड़काव की जरूरत 
दुनिया भर में मच्छर यदि पैदा हो रहे हैं तो वह केवल इंसानों की नासमझी और लापरवाही के कारण है। यह वैज्ञानिक तथ्य है कि मच्छर केवल पानी में ही पैदा होते हैं और उसमें भी अधिकांश मच्छर गंदे पानी में ही अंडे देते हैं जिससे पूरी फौज तैयार हो जाती है।

नगर निगम ने आज तक इस मामले में कभी भी समझदारी से फैसला नहीं लिया और फाॅगिंग मशीन चलती भी है तो सड़कों या काॅलोनियों में। इससे मच्छर कुछ देर के लिए मौके से फरार हो जाते हैं। मच्छरों से यदि शहर को निजात दिलाना ही है तो उनके पैदाइशी स्थलों पर हमला करना होगा, ताकि उनका समूल नाश किया जा सके।

शहर में कभी 52 ताल-तलैया थे जिनमें से अब करीब 38 ही बचे हैं, लेकिन मच्छरों को पैदा करने के लिए इतने ही काफी हैं। इसके साथ ही नाले और नालियों के साथ ही अनेक ऐसी जगह हैं जहाँ मच्छरों की लगातार पैदावार हो रही है किन्तु नगर निगम ऐसे स्थलों पर इसलिए कीटनाशकों का छिड़काव नहीं करता, क्याेंकि इससे हर साल मच्छरों को मारने के नाम पर किया जाने वाला खर्च बंद हो जाएगा और फिर कमीशन नहीं मिलेगा।

केवल मच्छरों को मारने के नाम पर ही नगर निगम हर साल डेढ़ करोड़ रुपयों से अधिक की राशि खर्च करता है। इसमें कीटनाशकों और ईंधन के अलावा कर्मचारियों का खर्च होता है। यह पूरी राशि अधिकांश सड़कों, काॅलोनियों, कार्यालयों आदि में छिड़काव पर ही खर्च कर दी जाती है। छिड़काव में मेलाथियॉन और किंगफाग कीटनाशकों का इस्तेमाल होता है और इनसे मच्छर मरते नहीं, बल्कि भाग जाते हैं।

नगर निगम के अधिकारी भी इस तथ्य से वाकिफ हैं इसके बाद भी हर साल यह दिखावटी कार्य पूरे जोर-शोर के साथ किया जाता है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर मच्छरों पर लगाम कैसे लगाई जाए तो इसके लिए मूल पर हमला करना होगा। मच्छरों की अधिकांश पैदावार पानी में ही होती है जहाँ मादा मच्छर अंडे देती हैं। ये लार्वा होते हैं और यदि पानी वाली जगहों पर ही लगातार रसायनों का छिड़काव हो, साफ-सफाई हो तो मच्छरों से निपटा जा सकता है।

यह किया जाना चाहिए

जहाँ भी पानी का जमाव हो वहाँ जले हुए ऑयल काे डाला जाना चाहिए।
झाड़ियों की कटाई होनी चाहिए।
पार्कों में लगातार सफाई हो।
नालियों में पानी जमा न हो इसका ध्यान रखा जाए।
घरों और दुकानों की जाँच हो और लार्वा मिलने पर जुर्माना किया जाए।
पेयजल लाइनों के लीकेज बंद होने चाहिए।
कुओं और बावड़ियों की भी सफाई होनी चाहिए।

5 एमएल पानी में हजारों लार्वा
आम घरों और अन्य स्थानों पर भी मच्छर पैदा होते हैं। घरों की छतों पर अक्सर कबाड़ होता है जिनमें टायर, डिब्बे, पुराने बर्तन, नारियल के खोल, खाली गमले आदि रखे होते हैं और इनमें यदि 5 एमएल पानी भी जमा हो तो उसमें हजारों मच्छर पैदा हो सकते हैं। यही हाल घरों के अंदर भी होता है। लोग बैम्बू पॉट रखते हैं, पॉट में पानी भरके फूल सजाते हैं, मनी प्लांट को पानी के पॉट में लगाते हैं। ऐसे पॉट का पानी यदि दो दिन भी नहीं बदला जाए तो उनमें मच्छरों के लार्वा हो सकते हैं। बंद कूलरों में पानी भरा रहता है उनमें तो लाखों की संख्या में मच्छर पैदा हो सकते हैं।

यहाँ पैदा होते हैं अधिकांश मच्छर
तालाबों और ऐसे स्थान जहाँ पानी हमेशा जमा रहता है मुख्य रूप से वहीं पर मच्छरों की बम्पर पैदावार होती है। इनमें नालियाँ और नाले भी शामिल हैं, क्योंिक शहर की नालियों की डिजाइन ऐसी नहीं है कि पानी हमेशा बहता रहे। कई काॅलोनियों और मार्गों के पास बनीं नालियाँ चोक रहती हैं जिनमें पानी भरा रहता है और उनमें मच्छरों की भरमार होती है, इसी प्रकार शहर के पार्कों, चौराहों, तिराहों आदि पर फव्वारे लगाए जाते हैं जो कभी चलते नहीं लेकिन उनमें पानी हमेशा भरा रहता है, पेयजल लाइनों में लीकेज वाले जो स्थान हैं वहाँ भी पानी भरा रहता है यहाँ भी मच्छर पैदा होते हैं।

पार्क बने मच्छरों की फैक्ट्री
शहर में बनाए गए पार्क अब मच्छरों की फैक्ट्री बनते जा रहे हैं। मनमोहन नगर पार्क में निगम ने खूबसूरती के लिए एक बड़ा पाँड बनाया था जिसमें पानी भरा रहता है। स्थानीय लोग परेशान हैं क्योंिक इस पाँड का पानी बदबू मारता है और उसमें मच्छर पैदा होते हैं। नगर निगम से कई बार माँग की गई कि उसका पानी खाली कराया जाए, लेकिन ऐसा होता नहीं। इन पार्कों में जंगली झाड़ियाँ भी जमकर फल-फूल रही हैं लेकिन कभी सफाई नहीं होती है। भँवरताल और गुलौआ में ही हर तरफ पानी नजर आता है लेकिन कभी इस पानी में कीटनाशक नहीं डाला जाता है।