जीसीएफ रोड के गड्ढों में गिरकर बुजुर्ग के टूटे दाँत, कहा- कभी इतनी जर्जर नहीं थी यह सड़क - eaglenews24x7

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जीसीएफ रोड के गड्ढों में गिरकर बुजुर्ग के टूटे दाँत, कहा- कभी इतनी जर्जर नहीं थी यह सड़क


जबलपुर, जीसीएफ मुख्य गेट से नाके तक गड्ढों की भरमार, श्रमिक नेताओं का कहना एमईएस ध्यान नहीं दे रहा

दोपहर करीब 12 बजे का वक्त था। स्कूटी पर सवार एक बुजुर्ग सिविल लाइन की ओर से रांझी जा रहे थे। जीसीएफ मुख्य द्वार से थोड़ा आगे बढ़े ही थे कि सड़क पर एक बड़े गड्ढे में उनकी स्कूटी का अगला चका फँस गया और वे गिर गए। सौभाग्य से कोई दूसरा वाहन उनके आसपास नहीं था वरना क्या होता इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। उन्हें उठाया गया तो पता चला कि बुजुर्ग के दो दाँत टूट चुके हैं और मुँह से खून बह रहा है।

बुजुर्ग को चोटों की चिंता से ज्यादा घबराहट इस बात की थी कि स्कूटी को कुछ हुआ तो नहीं वरना बहु उनकी खबर ले लेगी। इसके बाद उन्होंने फैक्ट्री के नेताओं को खरी-खोटी सुनानी शुरू की। वे खुद कभी जीसीएफ में ही कार्यरत थे। उनका कहना था कि यह सड़क कभी इतनी खराब नहीं थी, उन्होंने साफ कहा कि श्रमिक नेता अब केवल अपने मतलब पर आंदोलन करते हैं।

जीसीएफ की मुख्य सड़क इन दिनों ऐसी कई घटनाओं की साक्षी बन रही है। इस सड़क पर इतने बड़े-बड़े गड्ढे हो गए हैं कि चलना मुश्किल हो गया है। रोजाना यहाँ कोई न कोई वाहन चालक गिरता है और प्रबंधन को कोसते हुए आगे बढ़ जाता है।

घायल बुजुर्ग ने भी शर्ट से धूल हटाई और मुँह में रुमाल फँसाकर खून को रोका और स्कूटी स्टार्ट कर ली। यह सड़क इतनी खराब होने के बाद भी इसकी मरम्मत पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया, इस मामले में जब श्रमिक नेताओं से चर्चा की गई तो उनका कहना था कि सड़क का निर्माण और मरम्मत एमईएस द्वारा किया जाता है। कई बार प्रबंधन से चर्चा की गई लेकिन अभी तक कोई हल नहीं निकला लेकिन अब शांति से काम नहीं चलेगा और श्रमिकों को अपनी ताकत दिखानी होगी।

त्योहार में लाखों लोग हुए हलाकान
शहर को रांझी, गोकलपुर, व्हीकल, खमरिया आदि क्षेत्रों से जोड़ने के लिए जीसीएफ मार्ग ही सबसे बेहतर विकल्प है। यही कारण है कि रोजाना हजारों लोगों की इस मार्ग से आवाजाही होती है और अभी त्योहार के समय तो इस पर लाखों लोगों ने वाहन दौड़ाए लेकिन जैसे ही वे मार्ग के जर्जर हिस्से से निकले तो उन्होंने प्रबंधन पर आक्रोश जरूर जताया। एक समय ऐसा भी था जब नगर निगम की सड़कों की तुलना में सुरक्षा संस्थानों की सड़कें कई गुना बेहतर होती थीं लेकिन अब मामला एकदम विपरीत हो गया है।